"क्या शिखर का कार्य पूर्ण न होने की स्थिति में राममन्दिर में मन्दिर अधूरा रहने पर श्री रामजी की प्रतिष्ठा शास्त्रसम्मत है?

16 Jan 2024   |    125

~ Megha

Megha answered this.

16 Jan 2024

देवमन्दिर की प्रतिष्ठा दो प्रकार से होती है

(1) सम्पूर्ण मन्दिर बन जाने पर तथा (2) मन्दिर में कुछ काम शेष रहने पर भी। जहाँ पर सम्पूर्ण मन्दिर बन जाने पर देवप्रतिष्ठा होती है वहाँ गर्भगृह में देवप्रतिष्ठा होने पर मन्दिर के ऊपर कलशप्रतिष्ठा संन्यासी के द्वारा की जाती है। कलशप्रतिष्ठा गृहस्थ के द्वारा नहीं होती। 


गृहस्थ के द्वारा कलशप्रतिष्ठा होने पर वंशक्षय होता है। मन्दिर का पूर्ण निर्माण हो जाने पर देवप्रतिष्ठा के साथ मन्दिर के ऊपर कलशप्रतिष्ठा होती है। जहाँ पर मन्दिर पूर्ण नहीं बना रहता वहाँ देवप्रतिष्ठा के बाद मन्दिर का पूर्ण निर्माण होने पर किसी शुभदिन में उत्तम मुहूर्त में मन्दिर के ऊपर कलशप्रतिष्ठा होती है। अतएव वैदिक-मूर्धन्य श्री अण्णाशास्त्री वारे महोदय द्वारा निर्मित 'कर्मकाण्डप्रदीप' ग्रन्थ में पत्र ३३८ में इति व्रतोद्यापन-वदध्वहःसाध्यः सर्वदेवप्रतिष्ठा प्रयोगः समाप्ति के

बाद अथ कलशारोषणविधिः” से आरम्भ कर इति प्रतिष्ठासारदीपिकोक्त: कलशारोपणविधिः" तक स्वतन्त्र

रूप से कलशारोपणविधि दी गयी है।


पाक्चरात्रागम में ईश्वरसंहिता का अग्रिमवचन भी उक्त व्यवस्था के विरुद्ध नहीं है। वचन इंसप्रकार है-

" प्रासादाङ्गेषु विप्रेन्द्राः! क्रमान्निगदितेषु च |

देवताधारभूतेषु यद्यदर्ज न कल्पितम् ॥

यंत्र वा तत्तदधिकं तत्रापि च समाचरेत् ।

तत्तत्स्थाने तु बुद्ध्या तु देवतान्यासमूहतः ॥”

(ईश्वरसंहिता अध्याय ३ श्लोक १६५-१६६५०३२)

बृहन्नारदीय पुराण में कहा है-

-

'अकृत्वा वास्तुपूजां यः प्रविशेन्नवमन्दिरम् ।

रोगान् नानाविधान् केशानश्नुते सर्वसङ्कटम् ॥

अपाटमनाच्छन्नमदत्त बलिभोजनम् ।

गृहं न प्रविशेदेवं विपदामाकरं हि तत् ॥ "

(बृहन्नारदीय पुराण, पूर्वखण्ड, अध्याय ५६ श्लोक

६१८- ६१९, पत्र ११६)

-

तदनुसार मन्दिर में द्वार (कपाट = किवाड़) जबतक

नहीं बनता तथा मन्दिर पर जबतक आच्छादन नहीं होता

अर्थात् मन्दिर जबतक नहीं ढका जाता और वहाँ वास्तुशान्ति जबतक नहीं होती तथा उसमें देवताओं को यथायोग्य माषभक्त बलि एवं पायसबलि नहीं दी जाती तथा वास्तुशान्ति का अद्‌भूत ब्राह्मणभोजन जबतक नहीं होता तबतक मन्दिर में देवप्रतिष्ठा नहीं हो सकती ।


लोकव्यवहार में एक मंजिल (भवन) बनने पर भी वास्तु- शान्ति करके लोग गृहप्रवेश करते हैं। बाद में गृह का ऊपरी भाग बनता है। अत: पूर्ण भवन बनने पर ही वास्तु प्रवेश होगा ऐसा नहीं कहा जा सकता। देवमन्दिर देवगृह है, अतः उसमें उक्त नियम लागू होगा प्रस्तुत अयोध्या के राममन्दिर में प्रतिष्ठा के पूर्व वास्तुशान्ति, बलिदान एवं ब्राह्मण भोजन होने वाला है। मन्दिर के दरवाजे लग गये हैं। गर्भगृह पूर्ण रूप से शिलाओं द्वारा ढका गया है। अतः उसमें रामप्रतिष्ठा करने में कोई दोष नहीं है। मन्दिर का काम पूर्ण होने पर कर्मकाण्ड प्रदीप में उद्धन प्रतिष्ठासार दीपिकोक्त कलशारोपणविधि के अनुसार कलशारोपणहोगा।

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